थर्ड डिग्री बनाम तीसरी परम्परा
अजीब पशोपेश है जी........ ये दो विचार हैं......... नेक हैं....... एक में हम चकड़धम चिल्लापुरी को प्यार से बैठाते हैं......... दारू शारू.......... मुर्गा ! फिर जब वो एक हाथ का तकिया लगाए अधलेटा सा होता है तब स्नेह की चाशनी में सराबोर प्रश्न के बीड़े उसकी ओर सरकाते हैं......... श्रीमान चकड़धम चिल्लापुरी जी फलाना मर्डर केस में आप भी तो थे ना ...... हे हे और कौन-कौन था जी आपके साथ प्लीज बताइये ना ...... कैसे किया जी मर्डर और चाकू कहॉं छिपा रक्खा है ..... कुछ तो बोले जी। एक और भी विचार (तरीका) है..... थोड़ा पुलिसिया है जनाब...... इसमें सबसे पहले तो चकड़धम चिल्लापुरी को उल्टा..... फिर तेल पिये हुए डन्डे..... और फिर -अबे- सच-सच बता-ये मर्डर कैसे किया @और कौन-कौन थे तेरे साथ,@चाकू कहॉं छिपा आया!जहाँ -जहाँ @ है वहॉं-वहॉं मातृ पक्ष के लोगो के लिए सशस्त्र सलामी है । दोनो ही तरीके अतिवादी हैं दोनो ही अजीब हैं पहले से केस ही नही खुलता.... दूसरे से केस के अलावा जाने क्या-क्या खुल जाता है। जॉंचें,डिपार्टमेन्टल इन्क्वाइरी, और जाने क्या-क्या। पुलिस की फजीहत दोनो से है। एक जो अच्छी छवि के लिए ईजाद किया गया ह...


कुछ पलों का साथ देकर जो चले,
जवाब देंहटाएंउम्र भर वो रहगुजर याद आयेंगें !!
bahut achche... really
बहुत अच्छा अधिकार है आपका. ग़ज़ल अच्छी लगी, खासकर ये शेर -
जवाब देंहटाएंइश्क करना था सुना इंसा का शगल है,
प्यार में झूमते ये जानवर याद आएगें।
बेहतरीन। बधाई।
जवाब देंहटाएंसमेट लो इन नाजुक पलों को
न जाने ये लम्हें कल हो ना हो।
ग़ज़ल के शेर और पुलिस का दिल क़यामत का मेल है
जवाब देंहटाएंछोटे भाई के एक बैचमेट अनायास याद आ गए हैं, यशवंत. राज्य पुलिस सेवा के प्रशिक्षण के दौरान इसी तरह उर्दू के अदब से परेड ग्राउंड को मीठा बनाये रखते थे. अब पता नहीं दस साल तक पुलिसिया कार्यों के कारण कैसे होंगे. आपके इन खूबसूरत शेर के साथ कल फोन करता हूँ.
देखा किए इक जल्लाद हर वर्दी वाले में
जवाब देंहटाएंअब तो ये हर्फ-ए-दिलावर याद आएँगे।
हाँ बस ऐसे ही अल्फाज़ ..दिल को छू जाते हैं ।
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