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रक्षाबंधन

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रक्षाबंधन (मेरी सब बहनों को अपराधबोध के साथ) इस बार रक्षा बहनों को बाँधो बांधकर सहेज लो एक रिश्ता तब जबकि तुमने एक दुधमुंही रुलाई को एक चित्कार में बदला है आख़िरी ठोस मृतपाय...

लड़कपन की मासूम एक पुलक को बदल डाला है एक सिसक में दबी घुटी घुटी सी सिसक जो साल दर साल खुरचती रहेगी आत्मा का अंश...

निश्छल एक तरुणाई को खून के चिकत्तों में बदल डाला है जो आँख के कोरों में बढते हैं दाग बनकर ता उम्र चेहरे पर परछाईं सा छा जाते हैं काली घनी अंधेरी...