शुक्रवार, 9 दिसम्बर 2011

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

ज़ख्म नए हैं टीस पुरानी

बहुत दिनों से तरवताल खाली.. गुमसुम.. चुपचाप सा पडा रहा! इतना कुछ पढने को है ब्लॉग की दुनिया में कि लिखने का मौक़ा ही नहीं मिलता ..खैर ..आज अपनी एक पुरानी ग़ज़ल लगा रहा हूँ ..

ज़ख्म नए हैं टीस पुरानी
कैसे कहूं इसे नई कहानी !

दाग नहीं , तो पड़ जाएगा
सूख चुका सब आँख का पानी !

किस्मत की लकीर पोंछ दूं
हाँथ नहीं दिल की मनमानी !

आओ कुछ सामान जुटा लें
हमें यहीं फिर राह बनानी !

मौला मेरी रज़ा पूछता
कह देता दामन पेशानी !!

शुक्रवार, 25 जून 2010

कुम्भ प्रीमिअर लीग


कुम्भ पीमीयर लीग

स्टेडियम खचाखच भरा था। पैवेलियन हर की पौड़ी पर ही कई नामचीन (नाम जापान और नाम पाकिस्तान भी ) हस्तियॉ मौजूद थी। अजीब सा मैच था आज। कहने को तो कई टीमें थी। जो वैचारिक ,अहसासी और कागजी रुप से तो एक बड़ी टीम का हिस्सा थी. लेकिन मैच शुरु होते ही लगने लगा कि सभी भारतीय खेल शैली के क्लासीकल अंदाज अर्थात डिफेन्सिव फार्म में खेलते हुए एक दूसरे की तरफ गेंद पास करने में लग गई । ये के0पी0एल0 (कुम्भ पीमीयर लीग) का एक महत्वपूर्ण मैच था जो 13-32 के फार्मेंट में खेला जा रहा था। पहला झटका रात को ही लग गया। गौरतलब है कि मैच नाइट -डे-नाइट-डे- नाइट -डे था। मायापुर मिस्टीरियर्स और हरिद्वार हूटर्स एक दूसरे को मिलने वाले पासों से परेशान थे। गेंद कहीं से भी आ जा रही थी। मैदान के आजू बाजू लगी बांउड्रीवाल की स्टिकें (खपच्चियॉ) गेंद रोकने में असमर्थ थीं। वैसे हरिद्वार हूर्टस को एक बडी परेशानी ड्रिंक्स ट्राली से भी थी, जो हूर्टस के कथनानुसार और जिसके प्रमाण रूप में वेा की गयी रिर्काडिंग से डेर्फड लाईव प्रसारण कर सकने की बात कह रहे थे, लगभग दो सौ बार मैदान में आई और न चाहते हुए भी खिलाडियों को दो सौ बार डिंक ब्रेक लेना पडा और दो सौ बार दूसरी टीम के थ्रो से गेंद छूट गयी , वैसे जीआरपी जिपर्स ने कोशिश बहुत की जगह जगह जिप लगाने की लेकिन गेंद तो गेंद है जनाब, लुढ़क लुढ़क के कभी टनल तो कभी टूटी बाउन्ड्री वाल के रास्ते निकली। इनमें से बहुतों को फ्लिप करतें हुए कनखल कूलर्स के पाले में डालना था, लेकिन शायद बाजुबाने खुद कनखल कूलर्स, वहॉ की पिच ठीक नहीं थी। बाउंस बहुत था। इसलिये गेंद कभी जम्प कर रही थी तो कभी कभी दाए बायें गली मिडआन से उनकी बाउन्ड्री के बाहर। गेंदे बहुत फास्ट ,मीडियम पेस और टॉप स्पिन में बेलवाला ब्लूमर्स में घुस रही थीं। ब्लूमर्स के लिए शायद आज ग्लूम डे था। कुछ खिलाडी र्फाम में नहीं थे, कुछ के लिये ये पहला अर्न्तराश्ट्रीय मैच था तो कुछ दूसरी पिचों पर खेलने के आदी थे। लेकिन फिर भी ब्लूमर्स ने हार नहीं मानी । गेंदों को काफी देर तक होल्ड किया और जो नहीं हुई उन्हें धीरे-धीरे स्नीक कर दिया रोड़ी राक स्टार के पाले में । राकस्टार राक करते रहे। वैसे तो इन पर स्लेजिंग के बड़े आरोप लगते रहे लेकिन वो इस जुमले से चिपके रहे कि इष्क , युद्व और खेल में सब जायज है। गेंदों से जूझने के लिए उनके पास 36 हथकंडे थे उन्होंने 40 आजमाये( इनके कण्ठकण्डे डण्डकण्डे और लतकण्डे भी षामिल हैं) इन सभी कण्डों की प्रमाणित छायाप्रतियॉ अब भी इन खिलाड़ियों की कण्ठ हस्त और लात से प्राप्त की जा सकती हैं। गेंद तो फिर भी गेंद है जनाब पानी की तरह सूराख ढूंढ ही लेती है लालजीवाला लोकल्स इन्हीं सूराखों से परेषान थे। कांगड़ा किंगपिन्स और रोड़ी राक स्टार से आधिकारिक और जाहिरी तौर पर तो गेंदों की आमद नहीं होनी थी, लेकिन अनाधिकृत और छुपन छुपइयया के फार्म में गेंद के आखिरी टप्पों को इन्हें झेलना पड़ा। लोकल्स ने बड़े ही स्थानीय और देसी तरीके से कुछ को तो नीलधारा नाइटरोवर्स की तरफ रिवर्स स्वीप किया तो कुछ को बल्ले के नीचे दबा कर बैठा दिया। करते भी क्या आखिर गोलपोस्ट, विकेट और बालहोल दस कदम की दूरी पर ही था। मैच बड़ा ही मजेदार षिक्षाप्रद और खेल भावना से परिपूर्ण रहा। सभी टीमें जीत का हिस्सा रहीं और पूरी खेल भावना से ये दावे करती रहीं कि जीत का सबसे बड़ा हिस्सा उनके नाम है। इस हिस्सेदारी के कारण कहीं कहीं एक दूसरे पर आरोंपों का ठीकरा भी सरकाया गया। जैसे भीमगोड़ा बाइसेप्स पर आरोप लगे कि वो उन गेंदों को भी अन्डर पास कर रहे थे, जिन्हें ऊॅचा उठाना था। भीमगोड़ा बाईसेप्स भूपतवाला बाम्बर्स के बैकपास से परेशान थे। कांगड़ा किंगपिन्स पन्तदीप पैन्थर्स की बांउसर से खौफजदा थे। लेकिन ये आरोप प्रत्यारोप महज अपने योगदान को जस्टीफाई करने की कोशिशें थीं। सभी बहुत अच्छा खेले । अब आप ही बताइये कि इतनी बड़ी जीत का सेहरा क्या किसी एक के सर बंधना चाहिए।

सोमवार, 26 अप्रैल 2010

मुल्तवी


क्या ये महज इत्तेफाक था ..
मुझसे लगभग पांचवीं बार ये सवाल किया गया था
और मै निरुत्तर रहा हर बार
अपनी सारी सहानभूति निचोड़ने के बाद भी
मै उन्हें ये समझाने में असमर्थ था
कि
चमकीली तलवारों , ताज़ी राख के भभूतों और
चिलम से अलमस्त आँखों वाले बाबाओं
के लम्बे जुलूसों
(जिन्हें निकालने संभालने के लिए
पूरी सरकार
अपने सारे हथकंडों से तत्पर है
और यह समझाने के लिए
की सरकार का कोई धर्म नहीं होता
कागजी कार्यवाही पूरी पूरी है )
के आगे क्यों नहीं भेजा जा सकता
हालाँकि
मेरे पास इतना एक्सक्यूज है
की व्यक्ति की सुरक्षा देश की संप्रभुता एकता और
अखंडता के लिए
समानता का अधिकार
मुल्तवी किया जा सकता है थोड़ी देर के लिए ...
जुलूस के गुजर जाने तक .

बुधवार, 3 फरवरी 2010

जवाबदेही

जवाबदेही

दमरू बेचारा.. रात दिन का मेहनती... मानवाधिकार की हजार-हजार कवायदें काम नही आती यहॉ... दिन रात खटता भी है, और मिलता है मजदूरी के नाम पर आधा पौना! बाकी के हिस्सेदार माले मस्त हैं क्यों, क्योंकि ये पूंजीवाद और गणतन्त्र का मिश्रण है जिसमें कन्फयूजन ज्यादा है सिस्टम कम। ये हिस्सेदार अपना भी पाते हैं इसका भी दबाते हैं..... लिकिंक पिन हैं जी मेनेजमेंन्ट थ्यूरी के, अधिक क्रूड भाषा में बोलें तो दलाल।
हॉ तो दमरू बेचारा एक दिन मर गया.... नहीं नहीं कहानी खतम नहीं होती यहॉ..... बल्कि यहीं से शुरू होती है..... यह हमारी विडम्बना है कि देश की हर कहानी अंन्त से शुरू होने लगी है। मरा कैसे .डमरू छत से नीचे गिरकर..... छत पर क्या कर रहा था इसके कई जवाब हो सकते हैं... एक जवाब है,`कि छत पर टहल रहा था´..... घोसला घरोन्दा हाउसिंग सोसाइटी की निर्माणाधीन छत पर...... जिस पर अभी लेन्टर पड़ रहा था.... टहल रहा था... ये जबाब कई लोगो के माकूल है, फिट है - फिट है घोसला घरोन्दा के मालिक के लिए, फिट है कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा कंस्ट्रक्शन कम्पनी के मालिक/ ठेकेदार के लिए जिसने इस सोसाइटी के निर्माण का ठेका बीड़ा उठा रखा है... बाद में कुछ औरों के लिए भी शायद माकूल हो।
दूसरा जबाब जो अचानक सुन्दर सुन्दर तारिकाओ जैसी न्यूज रीर्डस जो समाचार कम एक्सर्पट कमेन्ट्स (नुख्ताचीनी जनाब)के लिए प्रतिबद्ध हैं के चेहरे से आपका फोकस हटाने के लिए स्क्रीन के निचले हिस्से के, जो बाजार की भाषा लिखावटी रूप में आपकी ललचाई ऑखों के सामने से गुजारता है, में फ्लड लाईट की तरह चमका..... और अचानक पूरे स्क्रीन को डस लिया......जवाब ..... `दमरू छत पर काम कर रहा था! निर्माणाधीन छत पर, जिसके नीचे सुरक्षा मानकों को धता बताते हुए कोई पिलर नहीं खड़े थे..... ऐसी परिस्थिति में दमरू काम के बोझ का मारा काम कर रहा था।´
तीसरा जबाब उहापोह और असमन्जस का बयानी जवाब है...... पुलिस का....... फिर से कहा जाये तो फिर एक विडम्बना है.... आज पुलिस का हर जवाब उहापोह और असमन्जस के तार से बंधा निकलता है और हर सवाल घटना की सच्चाई उजागर करने से ज्यादा अपनी बेगुनाही का सबूत ढूढने की कवायद से लिपटा रहता है। जवाब- `दमरू जैसा कि बताया गया.... छत पर था..... और मर गया...... हमें यहॉ वहॉ से पता चला कस्ट्रक्शन वालो ने कोई सूचना नहीं दी..... आवश्यक कार्यवाही प्रचलित है!´ उलझा हुआ संक्षिप्ध जवाब..... जनता/उच्चाधिकारियों की इस अपेक्षा को अपनी सफाई पेश करता सा कि पुलिस के पास जादू की छड़ी है उसे होने से पहले पता चल जाता है कि कुछ होने वाला है।
तीनो ही जवाब एक दूसरे से अलग..... जुदा अपनी कहानी मे। और फिर शुरू होती है आपा धापी... झींगामुस्ती अपने अपने जवाबों के साथ.......फोन पर फोन...... `जी मेरे लायक कोई सेवा हो तो बतायें´ कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा का ठेकेदार बोलता है बाकी दोनो से...... `अब आया ना ऊंट´.....मीडिया बोलता है मन ही मन..... `टेबिल पर आईये´ और टेबल पर अखाड़ा जमता है बोली लगती है..... दमरू की सॉस की बोली, दमरू की ऑखरी चीख की बोली.... दमरू के परिवार के बेबस भूख की बोली.... बोली.. बोली... बोली और अन्त में मीडिया बोलता नही,.. चुप रह जाता है। अचानक खामोश! कितने ही समाचार हैं जनाब दिखाने को, बताने को। कोई पूछता भी नहीं कि कल जो न्यूज 24 घण्टे तक ऑन स्क्रीन थी आज अचानक बेताल क्यों हो गयी ?
इधर पुलिस की जवाबदेही भी आराम से है `कौन पूछता है ऐसे दमरूओं को... टेबिल पर बैठे तो फाइनल रिपोर्ट नहीं तो चार्जशीट´।

शनिवार, 5 दिसम्बर 2009

घूमते रहे


सुख की कतरने चूमते रहे
जाम-ए-गफलत पी लिया,
झूमते रहे
हर गली, हर सड़क बावस्ता अंगूठे के
फिर भी किस चाह में
घूमते रहे!!

शुक्रवार, 20 नवम्बर 2009

पंजाब पुलिस अकादमी



ये दीवार-ओ-दर-याद आएंगें,
ये जमीं ये शजर याद आएंगें।

वो तरतीब औ तालीम औ तहजीब जो सीखी
हर्फ बा हर्फ शाम-ओ-सहर याद आएंगें।

इश्क करना था सुना इंसा का शगल है,
प्यार में झूमते ये जानवर याद आएगें।

मुस्तफा औ रकीब औ सरपरस्त,
भूल जाएं भी मगर याद आएंगें।

कुछ पलों का साथ देकर जो चले,
उम्र भर वो रहगुजर याद आयेंगें !!

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2009

थर्ड डिग्री बनाम तीसरी परम्परा


अजीब पशोपेश है जी........ ये दो विचार हैं......... नेक हैं....... एक में हम चकड़धम चिल्लापुरी को प्यार से बैठाते हैं......... दारू शारू.......... मुर्गा ! फिर जब वो एक हाथ का तकिया लगाए अधलेटा सा होता है तब स्नेह की चाशनी में सराबोर प्रश्न के बीड़े उसकी ओर सरकाते हैं......... श्रीमान चकड़धम चिल्लापुरी जी फलाना मर्डर केस में आप भी तो थे ना ...... हे हे और कौन-कौन था जी आपके साथ प्लीज बताइये ना ...... कैसे किया जी मर्डर और चाकू कहॉं छिपा रक्खा है ..... कुछ तो बोले जी।

एक और भी विचार (तरीका) है..... थोड़ा पुलिसिया है जनाब...... इसमें सबसे पहले तो चकड़धम चिल्लापुरी को उल्टा..... फिर तेल पिये हुए डन्डे..... और फिर -अबे- सच-सच बता-ये मर्डर कैसे किया @और कौन-कौन थे तेरे साथ,@चाकू कहॉं छिपा आया!जहाँ -जहाँ @ है वहॉं-वहॉं मातृ पक्ष के लोगो के लिए सशस्त्र सलामी है । दोनो ही तरीके अतिवादी हैं दोनो ही अजीब हैं पहले से केस ही नही खुलता.... दूसरे से केस के अलावा जाने क्या-क्या खुल जाता है। जॉंचें,डिपार्टमेन्टल इन्क्वाइरी, और जाने क्या-क्या। पुलिस की फजीहत दोनो से है।

एक जो अच्छी छवि के लिए ईजाद किया गया है (जी हॉं ये नई विचाराधारा से जन्मा है.....अल्ट्राडेमोक्रेटिक अल्ट्राह्यूमनिस्टिक है´.... प्राचीन भी नही पारम्परिक भी नही, मानव सभ्यता व स्वभाव से अलग, कृपया इसे चर्च के कन्फेशन बाक्स से अलग ही रखें) उससे नि:संदेह छवि अच्छी होती हैं पुलिस की...... अभियुक्त की नजर में बस `वॉह गुरू कुछ नही होने का दो चार को और ठोक दो ´

दूसरा तरीका जो परम्परा के ऋक्य और मानव सभ्यता और स्वभाव पर खरा उतरता है यकीन मानो मेरे विवेचक भाईयों ये भी फजीहत ही कराता है न...... भई अपने प्रमोशन/पोस्टिंग की चिंता छोड़कर नौकरी कितने लोग कर पाते हैं ?

तो जब दोनो ही तरीके सलीकेदार नही हैं फिर तीसरी परम्परा की खोज कैसे हो! इस प्रश्न का कीड़ा बहुतो के दिमाग में कुलबुलाया होगा। जाहिर है समाधान भी कई आये होगे। हम अपनी खोज शुरू करते है।

एक तरीका हो सकता है मिश्रण का। इसमें पहले तो चकड़धम को उल्टा...... फिर तेल पिए डन्डे और फिर श्रीमान जी फलाना...... प्लीज बताइए ना! नतीजा फिर वही सिफर क्योकि चकड़धम और उसके बाप दादे (मीडिया..... मानवाधिकार और .... और लोग माफ करें अभी) बाद का प्यार भूल जायंगे पहले की फटकार के लिए हजार हजार बार पुलिस को नाको चने चबवाएंगे।

दूसरा तरीका यह हो सकता है कि पहले चकड़धम को प्यार से बैठाते है..... दारू शारू मुर्गा ..... और फिर अगर न बताया तो उल्टा...... तेल लिए डन्डे.....! लेकिन जनाब ये तरीका भी फूलप्रूफ नही है । ये जो फ्रेज है ना `अगर न बताए तो´ ये सब पर लागू होने लगता हैं और अंतत: फिर वही बात!

मुझे तो लगने लगा है और लगता है,कि बहुतों को ऐसा लगता होगा कि तीसरी परम्परा की खोज करना ही व्यर्थ है । उस देश में जहॉं विज्ञान अभी अभी उठा जम्माइयॉं ले रहा है।फोरेंसिक `तो दूर की बात है आम जीवन में विज्ञान से जो एक सिस्टम बनना चाहिए था वो भी नही बना है ऐसे में तीसरी परम्परा का ढोल जो हम कहते है कि विज्ञान बजाए कैसे बजे´ !

यकीन माने चकड़धम चिल्लापुरी जी अभी तक मजे में हैं अपने कहे और किए से उन्हें कोई गुरेज नही हैं। उनकी चारो उंगलिया घी और सिर कढ़ाई (राजनीति) में है। आपके सच का ताप इसे पिघला नही सकता। इन्तजार कीजिए किसी तीसरी परम्परा के पैदा होने का...... विज्ञान का...... विज्ञान के नहा धोकर तैयार होने का तब तक??

अपना सिर तो है न धुनने के लिए!!

शुक्रवार, 11 सितम्बर 2009

यहीं है राजभाषा !!

छत भी हिन्दी ,छप्पर हिन्दी
बाना हिन्दी ,बिस्तर हिन्दी ....

संसदीय राजभाषा समिति की तीसरी उपसमिति द्वारा २८ जनवरी २००५ को मुख्यालय का दौरा करने के सम्बन्ध में बैठक ...मुख्यालय के अधिकारियों की बैठक ! कार्यवृत्त का ढांचा ही गलत ..भाषा की गलतियां ..वाक्यों की गलतियां !
अधिकारियों की अनुपस्थिति उनके हिंदी (राजभाषा ) के लिए प्रतिबद्धता के स्तर को बताती हुई !जो आये भी हैं वो महज इसलिए की उन्हें अभी सीखना है ....की खानापूरी कैसे की जाती है !सभी अंग्रेजीदां ...मजे की बात ..कोइ भी क्षेत्रीय भाषा का प्रतिनिधित्व नहीं करता ..हिंदी विरोध के लिए सभी अंगरेजी का करते हैं !
लगता है की हिंदी का मजाक उडाने के लिए बैठक है !सभी हंसते हैं ..अगर कोई तीन चार से ज्यादा शब्द एक वाक्य में लाता है हिंदी के ...तो मुस्कुरा कर स्वागत होता है ..हंसकर स्वागत होता है !
विचार विमर्श की हिंदी का प्रयोग कैसे बढे ?...नहीं वरन ये की महज १५ दिनों में आंकडों की फेरबदल कैसे हो ...कितनी धूल झोंकने से निरीछ्कों को बेवकूफ बना सकते हैं ? सुझाव ...फाइलों के ऊपर नाम हिंदी में हों ...रबर की मुहरें हिंदी में ...हिंदी किताबों की खरीद ...अनुवाद ...!!मूल कार्य हिंदी में करने की कोइ कवायद नहीं !और महानिदेशक (दक्षिण भारतीय और शायद बैठक में सबसे ज्यादा प्रतिबद्ध )का सुझाव फाइलों में भी कुछ कार्य हिंदी में करें ...कुछ अमहत्वपूर्ण कार्य !क्योंकी इतना बड़ा रिस्क तो हम ले ही नहीं सकते न !॥प्रयोग के पहले ही विश्वास ...की गलतियां होंगी ही ...यही है राजभाषा ...यहीं है राजभाषा !!

३१ जनवरी २००५ ,विदेश व्यापार महानिदेशालय ,नई दिल्ली

रविवार, 30 अगस्त 2009

देखा - सोचा



क्षण भर सोचा


मात्र क्षण भर


सोचा


की अभी अभी जो चेन स्नेचिंग हुयी उसके साथ


नुक्कड़ के मुहाने


और उसकी अपनी गली के सिरहाने पर


क्या बता दे पुलिस को


सोचा


उस सोच को


और देखा उस नजर को


जो देखकर सोचेंगी


कहाँ टिकी थी थी ये चेन ??


और फ़िर दूसरे ही क्षण


ये सोचकर


की चलो बस चेन स्नेचिंग ही हुई


देखा


घर का रास्ता !!

मंगलवार, 25 अगस्त 2009

ऋषभ तुम्हारी याद में


तब तक भयावह नहीं लगा
ये वेंटीलेटर
जब तक
मेडिकल साइंस की सीमा रेखा पर
ईश्वर के खड़े होने का भान लगा रहा
इन्तजार भी भारी न था
उस चमत्कार का
की शायद हमारी दुआओं
मन्त्र - श्लोकों
( की जिससे हम ईश्वर को जिंदा रखते हैं )
और माँ की गीली कातर आँखों
का एक टुकडा भी वहां पहुँच सके
जहां तुम ईश्वर की गोद में मुस्कुराते से लेटे थे
और ईश्वर
एक बार फिर
इस वातानुकूलित कमरे में
तुम्हारी साँसों को गर्म कर दे
लेकिन
इन भारी बड़ी मशीनों से
तुम्हारे फूलते पिचकते सीने में
भरा गया झूठ
हमें वहां पहुंचा न सका
जहां तुम ईश्वर की गोद में मुस्कुराते से लेटे थे
तुम
जिसने हमारे घर दरवाजे दीवारों पर
खिलखिलाहट पोती थी
तुम
जो अपनी पतली मुलायम उँगलियों के इशारे
और हल्की मुस्कान में
सीधे सच्चे और समझदार से दीखते थे
तुम
जो बड़ी आसानी से किसी की भी गोद में जा बैठते थे
अब की
तुमने ईश्वर को चुना
शायद ईश्वर को
तुम ज्यादा प्रिय थे

शनिवार, 15 अगस्त 2009

जब घर में आग लगा ली है

बचपने में कुछ ऐसे ही फूटते है उदगार ....


हर घर में बिन लादेन घुसा
हर हाँथ में आज दुनाली है
सीमा पर लड़कर क्या होगा
जब घर में आग लगा ली है !


हिन्दू मुस्लिम अगडे पिछडे
दूरी बढ़ती ,बढ़ते झगडे
बिन बात हमेशा रहे लड़े
थी आदमजात कभी अपनी
हमने कुछ और बना ली है
सीमा पर लड़कर क्या होगा
जब घर में आग लगा ली है!

रिश्तों की बधिया टूट गयी
थी प्रेम की कलई छूट गयी
दिल की गरमाई रूठ गयी
मखमल से संबंधों पर अपने
हमने पैबंद लगा ली है
सीमा पर लड़कर क्या होगा
जब घर में आग लगा ली है !

अज्ञान अनीति का कान्धा ले
बढ़ते जाते हैं धन काले
रिश्वतखोरी और घोटाले
घोटाले का चारा है
और घोटाले की थाली है
सीमा पर लड़कर क्या होगा
जब घर में आग लगा ली है!

युग पोत मस्तूल रहे हैं हम
संस्कृति को भूल रहे हैं हम
विस्मृति में झूल रहे हैं हम
पश्चिम के अर्जुन बानों पर
बूढी सी देह टिका ली है
सीमा पर लड़कर क्या होगा
जब घर में आग लगा ली है !

बढ़ती जाती है बेकारी
भुखमरी गरीबी लाचारी
छल कपट अनीति मारामारी
कौवे को झूठा है प्यारा
और सच को मिलती गाली है
सीमा पर लड़कर क्या होगा
जब घर में आग लगा ली है!!

सोमवार, 10 अगस्त 2009

नए झुनझुनों से बहलाने आये हैं


आज हमें इतिहास पढाने आये हैं
वो हमको हमसे ही मिलाने आये हैं

संभल संभल कर चलना सीखा जिससे
उसी द्रोड़ को शिष्य बनाने आये हैं

रिश्तों के भी दाम लगेंगे भाव बिकेंगे
वो घर को बाज़ार बनाने आये हैं

सुध बुध खोये इस बूढे बच्चे को
नए झुनझुनों से बहलाने आये हैं

बाँट रहे हैं अपना चश्मा अपनी भाषा
ये समता का पाठ पढाने आये हैं

विश्वग्राम की बात बताते फिरते हैं
पर ये बंदरबांट में खाने आये हैं

शनिवार, 1 अगस्त 2009

बाज़ार

अब घर में बाज़ार की आहट होती है
क्या खरीद किसकी बिकवाली करते हो...



दरवाजे पर दस्तक दी

हौले हौले अन्दर आया

सोफे पर बैठ गया

हाल चाल पूछा अपनों का

फिर सलाह दी

नजले जुखाम से जाम नाक को

ठीक करने की

बिलकुल अजनबी न लगा

जब उसने मेरी थाली में भात खाया

बात करते करते बंगाल की!

फिर चमकीले ग्रहों की कहानियां सुनाते सुनाते

बच्चों के साथ सो गया

उनके बिस्तर में

रात भर हम बहस में रहे

मै और मेरी बीवी

उसके चमकीले कपडों

और उजले रूप को लेकर

उसकी बातों से टपकती तहजीब

और आँखों का रेशमी रूमानीपन

हमें दो खेमों में बाँट गया

हम अलग अलग उसे प्यार करने लगे

वो तो सुबह के अखबार ने बताया

रात कई घरों में बाज़ार आया था !!

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

धारा ३७७

एक विज्ञापन -
सुन्दर, सुशील, गृहकार्य दक्ष बालक हेतु सरकारी सेवारत सजातीय वर चाहिए ...
एक वार्तालाप -
पापा , पापा कह रहे हैं आफिस से आते वक्त बाज़ार से चूड़ियाँ ले आना ...
एक त्यौहार -
भाई - भैया इस बार रक्षाबंधन पर क्या गिफ्ट लोगे ?...
एक पहेली -
बताओ तो तुम्हारे पप्पू चाचा के पत्नी तुम्हारे क्या लगे ?
उत्तर - चीचा , चाचा , चोचो ??....
एक फिल्म -
पत्नी पत्नी और वो ...
एक गाना -
राजा को राजा से प्यार हो गया ....
ये कैसा सामाजिक बदलाव है ...अपसंस्कृति , मानवाधिकार , फ्रीडम आफ च्वाइस , या मात्र विचारों का संक्रमण काल जो व्यवहार के स्तर पर उतर चुका है !!

शुक्रवार, 24 जुलाई 2009

एक और प्रेम कविता

क्या करें हमारे प्यार पर तो बाज़ार छा गया ....


शर्की सल्तनत की आखिरी निशानी
गिर चुके से ...
खँडहर से खड़े खड़े किले
की ऊबी दीवारों पर
जब तुमने लिखा था हमारा नाम
ये सोचा ना होगा
की एक दिन हम
'बातवाला पीसीओ' के साइनबोर्ड के नीचे आ जाएंगे ॥
जिस पेड़ के पेट को छीलकर
तुमने पान के पत्ते सा कुछ उकेरा था
उसकी जड़ों के ऊपर अब ..
टायरों के निशाँ हैं
गिर चुके से
खंडहर से खड़े खड़े
किले की ऊबी दीवारों को देखने
अब भी कुछ लोग आते हैं
उनकी गाड़ियों के लिए
पार्किंग लौट तो चाहिए !!

बुधवार, 22 जुलाई 2009

मेरी प्रेम कविता

मै
....फटे अखबारों की तरह उड़ता रहा
यहाँ वहां
तुम
...मखमली फाहों के मानिंद
मुझे सहेजती रही !!

सोमवार, 20 जुलाई 2009

लोहिया -नरेश सक्सेना

लोहिया -नरेश सक्सेना
(मृत्यु से एक वर्ष पूर्व लिखी गयी )


एक अकेला आदमी
गाता है कोरस
खुद ही कभी सिकंदर बनता है
कभी पोरस
युद्ध से पहले या उसके दौरान या उसके बाद
जिरहबख्तर पहन कर
घूमता है अकेला
और बोलता है योद्धाओं की बोलियाँ
-खाता है गोलियाँ
भांग की या इस्पात की?
देश भर में होता है चर्चा
अपनी ही जेब से चलाता है
-देश भर का खर्चा
एक पेड़ का जंगल
शिकायत करता है वहां जंगलियों के न होने की!!

("समय" स्वर्ण जयन्ती विशेषांक -१९७८ से साभार )

सोमवार, 13 जुलाई 2009

अर्नेस्तो कार्देनाल की कविताओं का अनुवाद

तीसरी किश्त

कोस्टारीका में गाडीवान गाते हैं

सड़कों पर
मंदालिन लिए वे सफ़र में हैं .
तोतों के रंग में रंगी गाडियां चलती हैं

और रंगीन रिबन पहने बैल
छोटी छोटी घंटियाँ टुन्न टुनाते
और सींगो में फूल लगाए चलते हैं ।
जब यह कोस्टारीका में काफ़ी चुनने का वक्त होता है
और कहवे से भरी गाडियां चलती हैं
और वहाँ शहरी चौराहों पर बैंड बाजे बजते हैं
सन जोन्स की बालकनियों और खिड़कियों पर
लडकियां और फूल झूलते हैं
लडकियां ,
बगीचों की तरफ़ बढ़ती हैं
और प्रेसीडेंट सन जोन्स में पैदल चलता है !!

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

भ्रष्टाचार का गुणा गणित

सरकारी अमलों में भ्रष्टाचार (यहाँ मुख्यतः रिश्वत की बावत प्रयुक्त )के सम्बन्ध में बहुत सी उक्तियाँ ,फब्तियां और सिद्धांत चलन में हैं .चिट्ठाकार स्वयं एक सरकारी मुलाजिम है लिहाजा भुक्तभोगी के साथ कुकर्मकरता भी है (प्राइवेट गमलों (बतर्ज़ अमलों )में भ्रष्टाचार का अध्यन फिर कभी )...आपकी जुगाली के लिए कुछ नियम परिनियम प्रस्तुत हैं -
१ .अगर सही फंसेगा तो ना बचेगा ,अगर गलत फंसेगा तो साफ़ बचेगा. दूसरे शब्दों में- अगर पैसा कमाओगे और कहीं फंसोगे तो बच जाओगे और नहीं कमाया और फंसे तो नहीं बचोगे .
२ भ्रष्टाचार तो भ्रष्टाचार है चाहे वो एक रूपये का हो या सौ का .
३ . स्केल -

. स्केल






बहुतसे ??छोडे गए हैं.ये मेरी अपनी सीमा दर्शा रहे हैं.ज़रा नीचे के दो रिचटर स्केलों पर अपने को माप कर देखिये आपके अन्दर भष्टाचार का कितना भारी कम्पन है!!

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

वो नहीं आएंगी तुम्हे देखने -नागार्जुन

वो नहीं आएंगी तुम्हे देखने -नागार्जुन

तुम तो नहीं गईं थीं आग लगाने
तुम्हारे हाथ मे तो गीला चीथडा नहीं था.
आँचल की ओट में तुमने तो हथगोले नहीं छिपा रखे थे.
भूख वाला भड़काऊ पर्चा भी तो नहीं बाँट रही थी तुम,
दातौन के लिए नीम की टहनी भी कहाँ थी तुम्हारे हाँथ में,
हाय राम ,तुमतो गंगा नहा कर वापस लौट रही थी.
कंधे पर गीली धोती थी,हाँथ में गंगाजल वाला लोटा था
बी .एस .ऍफ़ . के उस जवान का क्या बिगाडा था तुमने?
हाय राम,जांघ में ही गोली लगनी थी तुम्हारे !
जिसके इशारे पर नाच रहे हैं हुकूमत के चक्के
वो भी एक औरत है!
वो नहीं आयेगी अस्पताल में तुम्हे देखने
सीमान्त नहीं हुआ करती एक मामूली औरत की जांघ
और तुम शहीद सीमा -सैनिक की बीवी भी तो नहीं हो
की वो तुमसे हाँथ मिलाने आएंगी!
(मार्च ७४ में बिहार छात्र आन्दोलन के समय कर्फ्यू में एक महिला को गोली लगने के सन्दर्भ में लिखी गयी नागार्जुन की सीधी कविता जो जौनपुर से प्रकाशित होने वाली साहित्यिक पत्रिका ”समय” के १५ जून १९७४ के अंक में प्रकाशित हुई थी.)

मंगलवार, 30 जून 2009

अर्नेस्तो कार्देनाल की कविताओं का अनुवाद

मै तुम्हे ये कवितायेँ देता हूँ :अर्नेस्तो कार्देनाल
अनुवाद -नरेन्द्र जैन -अंततः :कविता का सिलसिला

दूसरी किश्त

हमारी कवितायेँ
फिलहाल प्रकाशित नहीं हो सकतीं
वे हाथों हाथ प्रसारित होती हैं
पांडुलिपि या उनकी प्रतियाँ
लेकिन एक दिन लोग
उस तानाशाह का नाम भूल जाएंगे
जिसके ख़िलाफ़ ये लिखी गईं थीं
और
कवितायेँ ,पढी जाती रहेंगी !!

2.
हो सकता है इस साल
हम विवाह कर लें मेरे प्यार
और शायद हमें छोटा सा घर मिल जाए
और हो सकता है मेरी कविता पुस्तक
प्रकाशित हो जाए
या हम दोनों विदेश यात्रा पर निकल पड़ें
हो सकता है मेरे प्यार
की इस साल सोमोज़ा का पतन हो जाए !!

शनिवार, 27 जून 2009

अर्नेस्तो कार्देनाल की कविताओं का अनुवाद :

मै तुम्हे ये कवितायेँ देता हूँ :अर्नेस्तो कार्देनाल
अनुवाद -नरेन्द्र जैन -अंततः :कविता का सिलसिला



पहली किश्त

अंततः ख्याल रक्खो
क्लौडिया जब तुम
मेरे पास होती हो
क्योंकि हल्की सी जुम्बिश
कोई शब्द
क्लौडिया की एक आह
कोई हल्की सी भूल
शायद विशेषज्ञ एक दिन इसकी जांच करेंगे
और क्लौडिया का यह नृत्य
शताब्दियों तक याद रक्खा जाएगा !!


2

तुम जिसे मेरी कविताओं पर गर्व है
इसलिए नहीं की मैंने इन्हें लिखा
बल्कि इसलिए की वे तुम्हारी प्रेरणा थीं
हालांकि वे तुम्हारे खिलाफ लिखीं गईं थीं
तुम
बहुत बढिया कविताओं को प्रेरित कर सकती थीं
तुम
बेहतर कविताओं को प्रेरित कर सकती थीं .



अर्नेस्तो कार्देनाल स्पानी भाषा के महत्व पूर्ण कवि रहे हैं . कहीं हद्द तक एजरा पाउंड की कविताओं से समानता रखने वाली अर्नेस्तो की कवितायेँ उनके राजनीतिक विचारों का मुखर स्वर हैं . १९७९ में सोमोज़ा के खिलाफ क्रान्ति और तख्ता पलट की कार्यवाही हुई थी . अर्नेस्तो की कविताओं ने इस पूरे आन्दोलन को विचारात्मक आधार दिया था .
अर्नेस्तो और उनकी कविताओं , विचारों के बारे में आपकी जानकारियाँ आमंत्रित हैं .

बृहस्पतिवार, 25 जून 2009

एक ख्वाहिश फकत रह गई आख़िरी

अपनी भी कोई इक ख्वाहिश तो हो

दाम मिलने को तो मिल जाएँ बहुत

अपने जैसों की भी कभी नुमाइश तो हो .....

-सोचा था पता नही लोग कैसे लेंगे इस ब्लॉग को ...लेकिन टिप्पणियाँ पढ़कर अच्छा लगा! ऐसे ही मनोबल बढाते रहें !

गुरूजी वर्ड वेरिफिकेशन हटा दिया है...

धन्यवाद

रविवार, 21 जून 2009

UPSCउपासक की वेदना

अजीब मंदिर है ये भी! इतना विशाल की अन्दर आने में पूरा एक साल लगता है और मजे की बात की जरूरी नहीं की अन्दर आने ही दिया जाए! जब तक आप अपनी फूल मालाए , चढावे अक्षत आदि संभालते , एक दूसरे की धूल पसीने और दुर्गन्ध को झेलते झेलाते , कुछ क्रुद्धः कपि टाइप के लोगो की टांग खिचाई और टंगडी फंसाई से बचते बचाते दरवाजे तक पहुचते है की भड़ाक !दरवाजा बंद ...शो का टाइम ख़तम हुआ जैसा फिर बैठे आप कान खुजाइये और सर धुनिये की कलुए साले का तो चढावा भी कम था फिर कैसे अन्दर हो गया ?
ये पहला मंदिर देखा मैंने जहां परिक्रमा पहले होती है मंदिर की दर्शन बाद में !चार परिक्रमाए चार मौके ..अन्दर जाने के लिए तीन दरवाजे भयंकर !पहले दरवाजे की हाईट थोडी कम है इसलिए बड़े बड़े अकडू जो झुकते नहीं ...इस महादेव के आगे सर नहीं नवाते भीड़ जाते है भड़ाक से ...फिर सर पर गूमर लिए घूमते है और इंतजार करते है दूसरी परिक्रमा ..दूसरी बार इस दरवाजे के खुलने का .ये दरवाजा थोडा चौड़ा है इसलिए बहुत से दर्शनार्थी लाँघ जाते हैं .दरवाजे पर दो घंटिया हैं ,दोनों में आपस में कोइ मेल नहीं ,बजानी दोनों पड़ती है .बज गयी तो वाह जी वाह नहीं तो फिर घूमो !
अगला दरवाजा अचानक बहुत ही संकरा हो जाता है ..कुछ ही तीस मार खान इससे पार हो पाते हैं ।घंटियाँ भी यहाँ एक से एक बड़ी ... तोप जैसी .हाथ घिस जाते है पर आवाज नहीं निकलती .बज गयी तो ठीक नहीं तो बाहर .. outercorden में ।
इसके बाद का दरवाजा है सबसे जबरदस्त ..गर्भ गृह का दरवाजा !दरवाजे पर घंटियाँ नहीं हैं ..देवदूत हैं चार -पांच मानो अन्दर के भगवान ने अपने सिपाही लगा रखे हों ..इतने खतरनाक की सांस अटक जाती है आने वाले की .पूरा वैद ,पुराण ,मंत्र ,आरती सब बांच दो इनके आगे पर तस से मस नहीं होते और मजे की बात आपके चहरे पर हवाइयां उड़ रही हो ,पसीने से शर्ट का रंग धुल गया हो ,धड़कन की आवाज दो फिट दूर से हथोडे के माफिक सुनाई दे रही हो ॥पर इनके कानो पर जू नहीं रेंगती दिखती । दुनिया जहां की बाते बता दें इन्हें पर अचानक पूछ बैठेंगे की तुम्हारे घर के पिछवाडे वाली गली के आखरी मकान के पिछले दरवाजे पर कितनी खूँटियाँ हैं ...लो कर लो बात!तो जनाब इन देवदूतों से पार पाना आसमान से तारे तोड़ लाने के बराबर है ..कम से कम मुझ जैसे कम अक्ल अहमकों के लिए तो ऐसा ही है ।
पिछले जन्मो के अच्छे कर्म चाहिए या इस जन्म का साम- दाम- दंड- भेदी प्रयास ;माथे पर इबारत चाहिए या हाथों में लकीरें ,माँ बाप का आर्शीवाद चाहिए या दोस्तों की निर्दोष दुआएं ;व्यक्तित्व की सच्चाई चाहिए या कृतित्व में गंभीरता ;मन की सत्यता चाहिए या मस्तिष्क की तीक्ष्णता ;वस्तुस्थिति का धरातल चाहिए या सपनों का जाल चाह चाहिए ,आस चाहिए ,विश्वास चाहिए ..जाने क्या क्या चाहिए इस इश्वर के दर्शनों को ..मैं तो जान ना सका ...कम से कम इस जनम में तो नहीं !

मंगलवार, 16 जून 2009

कहाँ तक जाओगे ?

वो कहते है बहुत दूर तक नही जा पाउँगा ...पुलिस की नौकरी और ब्लॉग्गिंग ...देखते है ...

शनिवार, 13 जून 2009

परिचय

ये एक अजीब सा ब्लॉग है ... यहाँ बिना किसी आशा ,प्रत्याशा के कहीं का ईंट कहीं का रोडा जोड़कर कुछ अपनी कुछ पराई परोसने का प्रयास है ... यहाँ कविता होगी ... कहानी होगी ...लेख होगा ..विचार होगा ...वो सब कुछ होगा की जिसके होने से जिंदा रहने का एहसास होता है ...तो पुनश्च ........ये जीवन की आशा और प्रत्याशा का कच्चा चिट्ठा है

शुक्रवार, 12 जून 2009

समर्पण

नया कुछ अजब सा लिखूं
कही कुछ गजब सा लिखूं
दिल में समाए बस उतना लिखूं
सिमटे न मुझसे मै क्या क्या लिखूं
तुम्हारे लिए बस तुम्हारे लिए...

तुम्हे दिल का पैगाम दूँ
नया कुछ तुम्हे नाम दूँ
कहानी पुरानी जनम से हमारे
उसे एक अंजाम दूँ
तुम्हारे लिए बस तुम्हारे लिए ....

आओ नई एक दुनिया सजाए
खडा हो जहाँ प्यार पलकें बिछाए
छिटकी महक हो हँसी की खुशी की
आँखे जहाँ मेरी प्यारे सपने सजाएं
तुम्हारे लिए बस तुम्हारे लिए ....

दिल में दबा लो ये जज्बात सारे
मेरे मन को छू लो बस मन से तुम्हारे
तुम्हे दू जमी के ये रोशन नजारे
ला दू फलक से चमकते सितारे
तुम्हारे लिए बस तुम्हारे लिए ....

shuruaat

hi