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कविता: कवि-तान: कविता- न!: क-वितान
`कविता लिखने के लिए कवि होना ज़रूरी नहीं|’ ये ब्रह्म वाक्य मुझे एक `कविता: कल, आज, कल और परसों’ नामक भ्रामक गोष्ठी के दौरान मिला| भ्रामक इसलिए क्योंकि मैं इसके निमंत्रण पत्र/ सूचना को मोटापा कम करने की किसी जादुई मशीन का विज्ञापन समझ बैठा था और तत्काल उलट-पुलट कर कविता नामक किसी स्थूलकाय स्त्री को कमनीय काया में रूपांतरित हो जाने वाली तस्वीरें ढूँढने लगा था| तस्वीरें थीं मगर `कविता लिखने वालों’ की| यहाँ `कवियों’ की भी लिखा जा सकता था लेकिन ब्रह्मवाक्यों से मुखालिफ़त करना मेरी औकात में नहीं| इसे भी उसी श्रद्धा से देखता हूँ जिससे `आह से उपजा होगा गान’ को देखा गया| `कारण तात्कालिक है लेकिन प्रासंगिक है|’ कुशल-कवि-गुच्छ (जिसे प्रायोजक महोदय ने कविता-गुच्छ माने जाने की सिफारिश की|) जैसी किसी पुस्तक के विमोचन के अवसर (जिसे सबसे ज्यादा पुस्तक विक्रेता केंद्र ने भुनाया) पर हिन्दी के मूर्धन्य कवि ने खोला `जैसे समाजसेवा के लिए किसी न्यूनतम योग्यता की आवश्यकता नहीं होती, आप सत्ताईस माला की अट्टालिका में रहकर भी इसे `परफोर्म’ कर सकते हैं, अपराध करके भी `प्रायश्चित…
आपने इसे कविता कहा है। .... 
अनुनाद पर वीरपुर लच्छी  
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रक्षाबंधन

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रक्षाबंधन (मेरी सब बहनों को अपराधबोध के साथ) इस बार रक्षा बहनों को बाँधो बांधकर सहेज लो एक रिश्ता तब जबकि तुमने एक दुधमुंही रुलाई को एक चित्कार में बदला है आख़िरी ठोस मृतपाय...

लड़कपन की मासूम एक पुलक को बदल डाला है एक सिसक में दबी घुटी घुटी सी सिसक जो साल दर साल खुरचती रहेगी आत्मा का अंश...

निश्छल एक तरुणाई को खून के चिकत्तों में बदल डाला है जो आँख के कोरों में बढते हैं दाग बनकर ता उम्र चेहरे पर परछाईं सा छा जाते हैं काली घनी अंधेरी...

बाहर मै ... मै अंदर ...

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ये  कवितायेँ मेरे निजी अनुभव का इकबालिया बयान सा हैं ...समय के बरक्स मेरे होते जाने का प्रमाण ...ये हैं इसलिए मै  हूँ ...


बाहर मै ... मै अंदर ...

यहाँ से मंगा सकते हैं- शिल्पायन, १०२९५, लें नंबर १, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली-११००३२

आम आदमी आजकल

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आम आदमी आजकल
चित्र- गूगल से साभार 
आम आदमी आजकल
लड़ने पर उतारू है हर वक्त
उतारू एक उधड़ा हुआ शब्द है
बेहद क्लासिकल अंदाज़ मे उसके साथ आम आदमी
आम लड़कियों मे तब्दील हो जाता है

आम आदमी सख़्त नाराज़ है व्यवस्थाओं से
अन्दर घुसकर अपने चीख़ता है बेसाख़्ता
रंगीन कपड़े फाड़कर
जिस्म की ठोस कत्थई भूरी चिकनाई के साथ
एकम एक होना चाहता है आम आदमी
गुपचुप सहूलियतों के बाद भी

आम आदमी थककर हांफता है
फिर तर्जनी मे नीली स्याही पोतकर
भर्राई आवाज़ मे डूब जाता है

आम आदमी मर जाता है
अमर होने से पहले आजकल

बारूद की राख़ और चूल्हे की राख़ मे
‘बू’ का ही अन्तर नहीं जनाब
कहता है आम आदमी
हड्डियों के ढेर से अपना चश्मा लाठी और घड़ी चुनते चुनते
और ठस्स से फिलॉस्फर हो जाता है

आम आदमी आम आदमी का दुश्मन है आजकल
अपना दुश्मन है आम आदमी
ऐसा साधारण निष्कर्ष व्यवस्था के नंगेपन को बिला वज़ह जस्टीफ़ाई कर देगा
लेकिन कानूनी किताबें ऐसे निष्कर्षों का शिलालेख हैं

रेणु के दो नेपथ्य नायक ‘गरीबी और जहालत’
आम आदमी हैं वास्तव मे
जो अपनी समझ की घड़ी मे दो कांटों की तरह फंसे पड़े हैं
शमशेर !!
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