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आम आदमी आजकल

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आम आदमी आजकल
चित्र- गूगल से साभार 
आम आदमी आजकल
लड़ने पर उतारू है हर वक्त
उतारू एक उधड़ा हुआ शब्द है
बेहद क्लासिकल अंदाज़ मे उसके साथ आम आदमी
आम लड़कियों मे तब्दील हो जाता है

आम आदमी सख़्त नाराज़ है व्यवस्थाओं से
अन्दर घुसकर अपने चीख़ता है बेसाख़्ता
रंगीन कपड़े फाड़कर
जिस्म की ठोस कत्थई भूरी चिकनाई के साथ
एकम एक होना चाहता है आम आदमी
गुपचुप सहूलियतों के बाद भी

आम आदमी थककर हांफता है
फिर तर्जनी मे नीली स्याही पोतकर
भर्राई आवाज़ मे डूब जाता है

आम आदमी मर जाता है
अमर होने से पहले आजकल

बारूद की राख़ और चूल्हे की राख़ मे
‘बू’ का ही अन्तर नहीं जनाब
कहता है आम आदमी
हड्डियों के ढेर से अपना चश्मा लाठी और घड़ी चुनते चुनते
और ठस्स से फिलॉस्फर हो जाता है

आम आदमी आम आदमी का दुश्मन है आजकल
अपना दुश्मन है आम आदमी
ऐसा साधारण निष्कर्ष व्यवस्था के नंगेपन को बिला वज़ह जस्टीफ़ाई कर देगा
लेकिन कानूनी किताबें ऐसे निष्कर्षों का शिलालेख हैं

रेणु के दो नेपथ्य नायक ‘गरीबी और जहालत’
आम आदमी हैं वास्तव मे
जो अपनी समझ की घड़ी मे दो कांटों की तरह फंसे पड़े हैं
शमशेर !!
http://anunaad.blogspot.in/