घूमते रहे


सुख की कतरने चूमते रहे
जाम-ए-गफलत पी लिया,
झूमते रहे
हर गली, हर सड़क बावस्ता अंगूठे के
फिर भी किस चाह में
घूमते रहे!!

टिप्पणियाँ

  1. जीवन इसी का नाम है .......... चलते रहना ही काम है ...........

    उत्तर देंहटाएं
  2. वारे गए इस सादगी पर !
    चाहना खत्म हो जाय तो इंसानियत न खत्म हो जाएगी?

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर रचना
    बहुत बहुत धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. Wah kavi shab aap ko to lecturer hona chaiye tha hindi ka
    kha mar-pit me pad gye its not suit on ur human nature

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बाहर मै ... मै अंदर ...

बाज़ार