बाज़ार

अब घर में बाज़ार की आहट होती है
क्या खरीद किसकी बिकवाली करते हो...



दरवाजे पर दस्तक दी

हौले हौले अन्दर आया

सोफे पर बैठ गया

हाल चाल पूछा अपनों का

फिर सलाह दी

नजले जुखाम से जाम नाक को

ठीक करने की

बिलकुल अजनबी न लगा

जब उसने मेरी थाली में भात खाया

बात करते करते बंगाल की!

फिर चमकीले ग्रहों की कहानियां सुनाते सुनाते

बच्चों के साथ सो गया

उनके बिस्तर में

रात भर हम बहस में रहे

मै और मेरी बीवी

उसके चमकीले कपडों

और उजले रूप को लेकर

उसकी बातों से टपकती तहजीब

और आँखों का रेशमी रूमानीपन

हमें दो खेमों में बाँट गया

हम अलग अलग उसे प्यार करने लगे

वो तो सुबह के अखबार ने बताया

रात कई घरों में बाज़ार आया था !!

टिप्पणियाँ

  1. लाजवाब रचना है..........सोचने को मजबूर करती ........इस भौतिक संसार किया चित्रण करती

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  2. बहुत अच्छी कविता. आखिर तक सधी हुई ! मेरी बधाई !

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  3. Achchhee lagee apkee yah kavita....shabdon ka pravah badhiya hai.
    HemantKumar

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  4. Kya baat hai Bhai Keep it up shayaad duniya bahut dhekh li tumne.

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  5. bahut khoob amit ji.....jaari rakhiye......
    kuchh lines........
    har ek lamha main bikta raha bazar main,
    mujhe kharidte rahe log bina DISCOUNT ke.

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  6. अमित जी , कविता प्रभावी है रास्ता और किनारे बाँध के रखती हुई सी बढ़ती है

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