नए झुनझुनों से बहलाने आये हैं


आज हमें इतिहास पढाने आये हैं
वो हमको हमसे ही मिलाने आये हैं

संभल संभल कर चलना सीखा जिससे
उसी द्रोड़ को शिष्य बनाने आये हैं

रिश्तों के भी दाम लगेंगे भाव बिकेंगे
वो घर को बाज़ार बनाने आये हैं

सुध बुध खोये इस बूढे बच्चे को
नए झुनझुनों से बहलाने आये हैं

बाँट रहे हैं अपना चश्मा अपनी भाषा
ये समता का पाठ पढाने आये हैं

विश्वग्राम की बात बताते फिरते हैं
पर ये बंदरबांट में खाने आये हैं

टिप्पणियाँ

  1. सुध बुध खोये इस बूढे बच्चे को
    नए झुनझुनों से बहलाने आये हैं

    बड़ा रोचक बढ़िया अंदाज उम्दा प्रयास . लिखते रहिये .

    उत्तर देंहटाएं
  2. भई वाह पूरी ग़ज़ल लाजवाब.
    संभल संभल कर चलना सीखा जिससे
    उसी द्रोड़ को शिष्य बनाने आये हैं

    रिश्तों के भी दाम लगेंगे भाव बिकेंगे
    वो घर को बाज़ार बनाने आये हैं

    सुध बुध खोये इस बूढे बच्चे को
    नए झुनझुनों से बहलाने आये हैं
    आनन्द आ गया अमित भाई. वाह्

    उत्तर देंहटाएं
  3. विश्वग्राम की बात बताते फिरते हैं
    पर ये बंदरबांट में खाने आये हैं
    उम्दा रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. बेह्तेरेइन,उम्दा,लाजवाब ,यूही लगे रहिये..............

    उत्तर देंहटाएं
  5. रिश्तों के भी दाम लगेंगे भाव बिकेंगे
    वो घर को बाज़ार बनाने आये हैं

    Bahut khub likha hai.Badhai.

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बाज़ार

बाहर मै ... मै अंदर ...